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नेपाल की भारतीय क्षेत्रों पर कब्जे की महत्वाकांक्षी साजिस

नेपाल की भारतीय क्षेत्रों पर कब्जे की महत्वाकांक्षी साजिस

सुनने में तो हसी आएगी लेकिन यह एक कड़वा सच है। जो नेपाल अपने देश को ही एकजुट रख पाने में संघर्ष कर रहा है वो भारत के क्षेत्रो पर कब्जा करने की मंशा रखता है। by alok
ठीक कश्मीर की तरह। वो अलग बात है कि उसके पास पाकिस्तान जितना साधन नहीं है जिससे कि वो युद्ध छेड़ सके लेकिन चाहत जरुर है और उस चाहत को पूरा करने के लिए वो हमेशा अपने सिमित संसाधन में ही सही तरह-तरह कोशिस करते रहता है।
अभी हाल का ही एक ताजा मामला उतराखंड के “कालापानी” नामक एक क्षेत्र का है जो काली नदी का उद्गम स्थल भी है। उस पर अपना दावा जताने के लिए वहाँ के कई वामपंथी संघठन तरह-तरह की कोशिस कर रहे है।
उसका न्यूज लिंक निम्न है:-
https://www.jagran.com/uttarakhand/pithoragarh-12708000.html  (कालापानी कूच के एलान से हरकत में आई
सुरक्षा एजेंसिया, 7 aug 2015)

यहाँ इस लेख को पढ़ने से पहले यह समझना आवश्यक है कि यहाँ अधिकांश जगह प्रयुक्त नेपालियों का मतलब नेपाल के संपूर्ण जनता से नहीं है। दरअसल नेपाली से तात्पर्य लगभग गोरखा से ही है जो ज्यादातर उपर पहाड़ी पर बसे है।  वे भी हिन्दू ही है पर वे तराई में बसने वाले मधेशियों और अन्य जातियों को सदा हेय एवं घृणा की दृष्टि से देखते आए है और उनके साथ हमेशा से भेदभाव करते रहे है। उनकी जनसंख्या पुरे नेपाल में लगभग आधी से थोड़ा ही अधिक है, लेकिन हमेशा से सत्ता उनलोगों के ही पास रही है, अतः उनलोगों ने गोरखा संस्कृति को ही पुरे नेपाल पर थोप दिया है। गोर्खाली भाषा को ही नेपाली भाषा के रूप में जाना जाता है, और वहाँ एक बड़ी जनसंख्या द्वारा बोली जाने वाली हिंदी भाषा पूरी तरह उपेक्षित है। यहाँ तक कि नेपाली सेना में मधेशियो की भर्ती पर 2011 तक पूर्ण प्रतिबंध था। इस तथाकथित गोर्खाली संस्कृति को ही वे उग्र नेपाली राष्ट्रवाद के तौर पर प्रचारित कर रहे है। इनमें उनका साथ वामपंथी माओवादियों और अनेक भारतविरोधि तत्वों से मिलता आया है।
जैसा कि हम जानते ही है नेपाल लंबे समय से भारत विरोधी गतिविधियों को प्रश्रय देने में लगा है। पाकिस्तानीयों के लिए तो भारत में प्रवेश के लिए नेपाल एक महफूज रास्ता बन गया है। जितने भी अपराधी और आतंकवादी  भारत में वारदात को अंजाम देते है उसके बाद वो नेपाल का रुख करते है क्योंकि वो उनका एक सुरक्षित गढ़ बन गया है।
लेकिन अब तो एक कट्टर वामपंथी के पीएम बनने से यह स्थिति और भी विकट हो गई है।

पश्चिम बंगाल में वर्षो  से एक आंदोलन चल रहा है एक अलग राज्य गोरखालैंड के निर्माण की, जिसमें पश्चिम बंगाल के उत्तर में स्थित दार्जलिंग जिला को काट कर एक अलग राज्य बनाने की मांग हो रही है। लेकिन यह कोई समान्य राज्य निर्माण की मांग नहीं है, दरअसल यह आँदोलन नेपाली वामपंथियो की एक सोची समझी साजिस है और उनकी वृहतर नेपाल की महत्वाकांक्षी योजना की हिस्सा है। वहाँ पर ज्यादा संख्या में पहाड़ी मूल के नेपाली जाकर बस गए है और चूँकि अब वे वहाँ बहुसंख्यक हो गए है अतः अब उनको एक अलग राज्य ही चाहिए। जब अलग राज्य हो जाएगा तो पुलिस नियंत्रण इत्यादि सब कुछ उनके हाथ में हो जाएगा जिससे भारत विरोधी गतिविधि चलाने में और आसानी हो जाएगी।
नेपाल की प्रमुख वामपंथी पार्टिया जिस प्रकार से नेपाल की जनता में वृहतर नेपाल का मानचित्र पेश कर प्रचार कर रही है इससे स्थिति स्पष्ट है कि इस आंदोलन में भी उन्हीं माओवादियों का हाथ है।
एक news website पर प्रकाशित एक article जो अनिल कुमार द्वारा लिखी गई है उसका कुछ अंश दे रहे है।

“गोरखालैंड को कम्युनिस्ट माओईस्ट फेडरेशन आफ साउथ एशिया ने सन् 2002 में ग्रेटर नेपाल में शामिल किए जाने की मुहिम को आगे बढ़ाया था जिसे अब नेपाल के माओवादी हर प्रकार की हवा दे रहे हैं।
नेपाल में आजकल सुगौली संधि को लेकर एक इश्तिहार बांटा जा रहा है जिसमें ग्रेटर नेपाल के लिए पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के इलाके को भी शामिल करते हुए कहा गया है कि 4 मार्च 1816 को हुई सुगौली संधि नेपाल की जनता के साथ विश्वासघात है। इस नक्शे में पश्चिम बंगाल के उस भूभाग को प्रमुख रूप से दिखाया गया है जिसमें आजकल अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर कथित आंदोलन चल रहा है। इश्तिहार को जारी करने वाला माओवादियों के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ का संस्थापक बुद्धिनाथ श्रेष्ठ है जिसका कहना है कि ‘ग्रेटर नेपाल असंभव छै न’ अर्थात ग्रेटर नेपाल असंभव नहीं है। बुद्धिनाथ ने विराट नेपाल के नाम से एक पुस्तक भी लिखी है जिसमें उसने सुगौली संधि को नेपाल की जनता के साथ विश्वासघात बताया है। यह संधि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी जब नेपाल के राजा वीर विक्रम शाह और भीमसेन थापा प्रधानमंत्री हुआ करते थे। इसमें कहा गया है कि इस संधि के पहले नेपाल के पास करीब 3800 वर्ग किमी क्षेत्र था जिसमें से संधि के बाद करीब पौने नौ सौ वर्ग किमी क्षेत्र घटा दिया गया। बुद्धिनाथ श्रेष्ठ इस समय बहुत सक्रिय हैं और वह कह रहे हैं कि यह संधि जबरदस्ती करवाई गई थी जिसमें अंग्रेजों को यह भय था कि कहीं सुगौली के प्रतिनिधि चीन की मदद न करने लगे। कहा जा रहा है कि चीन के दबाव में इस संधि को तोड़ने की योजना बन रही है क्योंकि यह इलाका चीन के लिए हर दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है जिसे माओवादियों ने तोहफे के तौर पर चीन को सौंपने की तैयारी रची है। जिस ग्रेटर नेपाल की बात कही जा रही है उसमें चौबीसी राज्य, माझ-किरात, अठारह ठकुराई, गढ़वाल, कुमाऊं, सिरमौर, वाईसी, लिंबुआन-लेप्चा क्षेत्र प्रमुख रूप से शामिल हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रेटर नेपाल की मांग को 1987 में भी प्रचारित किया गया था जिसे माओईस्ट फेडरेशन का पूरा समर्थन था।”

इस आर्टिकल को आप निम्न लिंक पर जा कर पढ़ सकते है:- http://www.swatantraawaz.com/2/greater_nepal.htm (आपका नेपाली नौकर माओवादियों का एरिया कमांडर तो नहीं?)
इसके आलावा इन नेपाली माओवादियों ने भारत नेपाल सीमा को चिंहित करने वाला पिलर जो वीरान जंगली इलाके में था ऐसे हजारो पिलरो को उखाड़ दिया है। जिससे कि कुछ जगह पर भारत को नेपाल से अलग करने वाली सीमा रेखा ही मिट गई। और उसके बाद वे कुछ आगे बढ़ कर उस भारतीय जमीन पर अपनी दावा ठोकने लगे है। यह वाकई विकट स्थिति है।
न्यूज लिंक:-
1.>  http://m.bhaskar.com/news/MAT-BIH-PAT-c-268-142370-NOR.html ( खुलासा-!-एसएसबी की रिपोर्ट से मची खलबली, इसी पिलर से होता है बार्डर का निर्धारण नेपाल से जुड़ी बिहार की सीमा
से 716 पिलर गायब इसी पिलर से होता है दोनों देशों की सीमा का निर्धारण, 5 Mar 2014)
2.> http://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-dadagiri-of-nepal-in-no-mens-land-12480203.html?src=p1#sthash.2hPRHcz3.dpuf  (नोमेंस लैंड पर नेपाल की दादागिरी,
विकसित किए रिहायशी इलाके, 15 june 2015)
3.>  http://zeenews.india.com/hindi/sangam/top-news/nepal-occupies-indian-land-pillars-removed-by-flood-239077  (सावधान इंडिया! बाढ़ की आड़ में कब्जा कर रहा नेपाल, पढ़िए बॉर्डर का हाल, बन रहे नेपाली मकान, 19 NOV 2014)
*ये तीनो न्यूज लिंक अलग-अलग समय की और अलग-अलग प्रकार की है, लेकिन सभी नेपाली अतिक्रमण से ही संबंधित है।
अब तो हाल यह है कि भारत, नेपाल सीमा पर स्थित सभी 8000+ खम्भों में स्थाई gps लगाने जा रहा है, ताकि आगे से अगर कोई इसे चुराए या प्राकृतिक आपदा में कोई नुकसान हो तो पता लगाया जा  सके।
न्यूज लिंक:- http://m.aajtak.in/story.jsp?sid=830676   (भारत-नेपाल सीमा के हर खंभे पर होगा GPS)
एक पांचजन्य नामक पत्रिका में छपा न्यूज दे रहा हूँ जो है तो 2008 का लेकिन तब-तक नेपाल में माओवादी हिंसा छोड़ मुख्यधारा में शामिल हो गए थे। इससे उन नेपाली माओवादियों के साजिस का पता चलता है।
लिंक- http://panchjanya.com/arch/2008/1/6/File13.htm  (भारतीय सीमा पर रैली निकाल कर लगाये भारत विरोधी नारे) इसमें उतराखंड स्थित नेपाली सीमा पर माओवादियों ने रैली निकाला और जम कर भारत विरोधी नारे लगाए। उन्होंने भारतीय सेना नेपाल छोड़ो जैसे नारे लगाए और वहाँ लगे पिलरों पर “भारत” लिखे शब्द को खुरच-खुरच कर मिटा कर उसके जगह पर नेपाल लिख दिया।

अब थोड़ा और अतीत में जाते है। सन 1975 तक सिक्किम एक स्वतंत्र राज्य था, लेकिन वहाँ पर भी बड़ी संख्या में प्रवासी नेपाली जा कर बस गए थे, उन्होंने वहाँ के स्थानीय सिक्किमी भूटियाओं और लेप्चाओं को सताना शुरू किया, जैसे अभी असम के हिन्दुओ का हाल है उसी तरह। और उसी समय वहाँ का राजा भी भारत विरोधी रुख अपनाने लगा और अमेरिकी प्रभाव में जाने लगा। तब भारत ने सिक्किम पर सैन्य चढ़ाई कर दिया और एक झटके में उस पर कब्जा जमा लिया। उसके बाद वहाँ जनमत संग्रह हुआ और वहाँ के लोगो ने खुल कर भारत का सपोर्ट किया, इस प्रकार सिक्किम भारत का एक राज्य बन गया। ठीक इसी प्रकार की स्थिति नेपाली भूटान में भी उत्पन्न करने लगे, लेकिन वहाँ का राजा समझदार था, उसने तुरंत 1990 में एक कानून बना कर उन नेपालियों को अपने राज्य से खदेड़ना शुरू किया। इस स्थिति की तुलना हम तथाकथित गोरखालैंड की मांग से भी कर सकते है। इसी तरह  नहीं पूरा मधेश सुलग उठा है इन पहाड़ियों के गुलामी से आजादी पाने के लिए।
दरअसल कुछ नेपाली जो ‘अतिराष्ट्रवाद या अंधराष्ट्रवाद ही कहेंगे’ से पीड़ित है वे इतिहास के कुछ गलत तथ्य को लेकर भ्रमित हो गए है। जो सुगौली की संधि अंग्रेजो ने किया उसको लेकर हाय-तौबा मचा रहे है जबकि अंग्रेज 68 साल पहले ही जा चुके है, और नए भारत और नेपाल के बिच 1950 में फिर से नए सिरे से संधि हुआ है।
अब बताते है इसके पिछे का असली कारण। दरअसल इसके पीछे भी वही भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी तत्व है जो भारत को खंड-खंड टुकड़ो में बाटने का एक स्वप्न देख रहे है। इस कार्य में जितने भी भारत विरोधी तत्व है सभी ने हाथ मिला लिया है। चर्च भी नहीं चाहता कि नेपाल दुबारा हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़े और भारत नेपाल में हस्तक्षेप करें, इसके चलते वो इस गतिविधि को खुल कर support कर रहा है। चीन तो चाहता ही यह सब है। और पाकिस्तान भी नेपाल में अपने आतंकियों के लिए एक सुरक्षित गढ़ देखता है। अतः ये सारी ताकते नहीं चाहती कि नेपाल पर भारत का प्रभाव बढ़े जिसके परिणाम स्वरूप वो येन-केन-प्राकेण नेपाल के लोगो में भारत विरोधी भावना भर कर भारत विरोधी आंदोलन करवाना चाहते है। और इसके माध्यम बन रहे है वामपंथी विचारधारा वाले लोग और शिकार बन रही है भोली-भाली नेपाली जनता।
ऐसा ही उदाहरण भारत में भी देखा गया, जब नया तेलंगाना राज्य का गठन हुआ। तब नक्सलियों ने जम कर जस्न मनाया। और चन्द्रशेखर राव के cm बनते ही उनकी बेटी और लोकसभा सांसद कविता ने पहला बयान दिया कि तेलंगाना भारत का हिस्सा कभी रहा ही नहीं है वो एक अलग राष्ट्र है, उसे और कश्मीर दोनों को भारत में जबरजस्ती मिला दिया गया है।
इसका न्यूज लिंक निम्न है:-
https://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/hyderabad/Sedition-case-against-KCRs-Daughter-Kavitha/articleshow/40060453.cms
इस स्थिति से आप अंदाजा लगा सकते है कि ये सब भारत विरोधी गतिविधिया क्यों नहीं खत्म हो रही है।
©आलोक देश पाण्डेय, सिविल लाइन, बक्सर (बिहार)- 802101

 

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