क्या हम अभी भी गुलाम है?

दोस्तों एक दिमाग को झकझोर देने वाला पोस्ट पढ़िए।

क्या हम अब भी गुलामी में रह रहे है?

हाँ, ये बात भले ही सत्य है कि सरकार अब भारतीयों के हाथ में  ही आ गई है लेकिन अब भी हम स्वतंत्र नहीं है अब भी हम ब्रिटिश सरकार की मानसिक गुलामी में पल रहे है।

वैसे तो देश में, सरकार में  और सेना में बहुत सारे बदलाव आ गए है पर अभी भी कुछ वैसी बातें है, जिसे सुन कर हमारा खून खौल जाए।

हम तब तक कैसे स्वतंत्र कहलाएँगे जब तक हम उन गुलामी के प्रतिको को उखाड़ कर फेक न दे जो हमे रह-रह कर याद दिलाए तुम अभी भी हमारे गुलाम हो।

©आलोक

हाँ भाइयों हमारे देश में अभी भी ऐसी-ऐसी परंपराएँ चल रही है जो अंग्रेजों के लिए तो गर्व का बिषय हो सकती है परन्तु वह हर भारतीय के लिए एक अपमान की कड़वा घुट के समान है।

दोस्तों आज भी आजाद हिंद फ़ौज और अंग्रेजो के बिच के हुए लड़ाई में अंग्रेजो की तरफ से लड़ते हुए सैनिकों को शहीद करार दिया गया है और उनका स्मारक बना कर हरेक साल सम्मान भी किया जाता है जबकि वही आजाद हिंद फ़ौज के सेनानियों को सम्मान तो दूर उनको आंतकवादी करार दे दिया गया है।©आलोक

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1944 की लड़ाई में आजाद हिंद सेना भले ही हार गई हो लेकिन ब्रिटिशों की सेना को जबरजस्त नुकसान पहुँचा और 16000 से ज्यादा भारतीय सैनिक, नहीं नहीं अंग्रेजो के गुलाम या देशद्रोही भारतीय सैनिक अंग्रेजो की तरफ से लड़ते-लड़ते मारे गए। और उन देशद्रोहियों के याद में अंग्रेजो ने कोहिमा(नागालैंड) में एक भव्य शहीद स्मारक बनाया। आज भी उनका रखरखाव बड़े धूम-धाम से किया जाता है इसके लिए इंग्लैंड अपना पैसा खर्च करता है और जो भी भारतीय वहाँ जाता है उन देशद्रोहियों को आदरपूर्वक नमन करता है, लेकिन मैं केवल यहाँ आम भारतीयों की बात नहीं कर रहा हूँ अगर भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री भी वहाँ जाते है तो शहीदों(अंग्रेजो के लिए) उर्फ़ देशद्रोहियो को जरुर सलामी देते है क्योंकि हम तो हम तो अभी भी रानी विक्टोरिया के अधीन है और उनके सम्मान पर आँच आए ऐसा हम कैसे बर्दास्त कर सकते है।©आलोक

इस लिंक में पढ़िए कि किस प्रकार प्रणव मुखर्जी इन सैनिकों का गुणगान कर रहे है।

www.samaylive.com/nation-news-in-hindi/241917/president-pranab-mukherjee-recalled-kohima-war-martyrs.html

लिंक प्रणव मुखर्जी कोहिमा के देशद्रोहियो को श्रधांजली देते

यहाँ पर आम भारतीयों को भुलावे में रखने के इस युद्ध को भारत जापान युद्ध का नाम दे दिया जाता है। अब ये बताइए कि जब उस समय भारत आजाद ही नहीं था तो भारत और जापान के बिच युद्ध कैसा वो तो ब्रिटेन और जापान के बिच था, और जापान क्यों यह तो प्रत्यक्ष आजाद हिंद फ़ौज के साथ था जिसमें आजाद हिंद फ़ौज की मदद जापान कर रहा था।©alok

क्या आप ऐसा भी कह सकते है कि चूँकि सुबास चंद्र बोस जापान के मित्र थे इसलिए जापान-भारत युद्ध में वे जापान की मदद कर रहे थे। अगर ऐसा ही होता तो आजाद हिंद सेना की हार के तुरंत बाद सुबास चन्द्र बोस भारत की आजादी के लिए जापान के उस समय के कट्टर शत्रु रूस से समर्थन या सहायता मांगने नहीं रूस नहीं जाते। और उसी समय रूस जाते समय उनका प्लेन दुर्घटना ग्रस्त हो गया जिससे उनकी मौत हो गई लेकिन कुछ लोग ये भी कहते है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना नहीं हुआ था बल्कि रूस ने उनको सहायता देने से इंकार कर दिया और बंदी बना लिया नहीं तो वे अगर जिंदा भारत में रहते तो ऐसे आदमी नहीं थे जो छुप कर रहते।©आलोक

ये लिंक देखिए कि ब्रिटेन ने अपने पुरे सम्राज्य के इतिहास में नेता जी के साथ हुई जंग को ही सबसे बड़ी माना है।

http://archive.today/0bsqK

वही दूसरी तरफ उन गुलामों को तो आदर पूर्वक सम्मान दिया जाता है लेकिन आजादी के बाद भी उन आजादी के दीवानों “आजाद हिंद फ़ौज” के सैनिकों को सम्मान तो दूर “आंतकवादी” करार दे दिया गया।

नेहरु ने संसद मे आज़ाद हिंद फ़ौज को गद्दार कहते हुए आज़ाद हिंद फ़ौज के पूर्व फौजियो को सेना की तरह पेंशन और दूसरे सुविधाए देने से मना कर दिया था। जी हाँ मित्रों, आज की पीढ़ी ये सुनकर हिल जायेगी की कांग्रेस की नजर मे इस देश के लिए अपना बलिदान देने वाले मतवाले आज़ाद हिंद फ़ौज के फौजी गद्दार है। ये संसद के रिकार्ड मे दर्ज है। जब डॉ श्यामा प्रशाद मुखर्जी ने नेहरु से आजाद हिंद फ़ौज के पूर्व सैनिको को भारतीय सेना के मानदंड पर पेंशन और भारतीय सेना अपने सैनिको को रिटायर के बाद जो सुविधा देती है वो सब देने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन नेहरु ने कहा की “मै आजाद हिंद फ़ौज

को मान्यता नही देता, ये एक आतंकवादी कृत्य था। मैं किसी निजी सेना बनाने के

खिलाफ हूँ भले ही उसका इस्तेमाल

देश के लिए हो, इसलिए मै ऐसे

किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार

नही करूँगा।”

मित्रों, ये संसद के रिकार्ड में है।

लेकिन इतना ही क्यों दोस्तों यहाँ केवल एक ही कारनामे थोड़े है जिसके चलते मैं कह रहा हूँ कि हम अभी भी गुलाम है।

गोरखा रेजीमेंट की रानीखेत इकाई मे रानी लक्ष्मीबाई की शिकस्त एवं अंग्रेजो के झाँसी विजय के प्रमाणस्वरूप झाँसी का राजदंड अनुरक्षित और प्रदर्शित है क्या यह रानी लक्ष्मीबाई और समस्त क्रांतिकारियों का घोर अपमान नहीं है। हम कैसे मान ले कि हम पूरी तरह स्वतंत्र है जब तक कि हमारी सरकार या सेना रानी लक्ष्मीबाई को हराने में गर्व अनुभूति करती रहेगी।

तो क्या हमारे हीरो रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, नाना साहब, सावरकर और सुबास न हो कर रानी विक्योरिया, कैप्टन नील, विलियम स्लिम, डलहौजी और हैवलॉक है।

निश्चित रूप से नहीं, फिर भी देशद्रोहियों को सम्मान एवं शहीदों एवं क्रांतिकारियों का अपमान क्यों।©आलोक

ऐसी सरकार किस काम की जो देश के गौरव नहीं अंग्रेजो के गौरव को सम्भालने में लगी है।

सरकार को तुरंत चाहिए कि उन सभी परंपराओ को बंद करे जो हमारे राष्ट्रिय अपमान का बिषय हो तथा राष्ट्रिय सम्मान से जुडी कुछ नई परंपरा स्थापित किया जाना चाहिए।

दोस्तों इस मैसेज को इतना फैलाओ की ये बात सरकार तक पहुँचे और सरकार इस बिषय पर सोचने को मजबूर हो जाए।जय हिंद।जय भारत।©आलोक

लिंक- प्रणव मुखर्जी कोहिमा के देशद्रोहियो को श्रधांजली देते हुए

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लिंक– जिसमे ब्रिटेन ने नेता जी के साथ हुई अपनी लड़ाई को सबसे बड़ा माना है:- http://archive.today/0bsqK

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