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Nurpur Fort me

मेरी पहली हिमाचल यात्रा (भाग 1, नूरपुर किला)

मेरी पहली हिमाचल यात्रा

Part 1 (Day 01-04, 13-16 जून 2019 )
पहला पड़ाव दिल्ली…

जैसा कि मैं आपको अपनी यात्रा वृतांत सुनाने जा रहा था जहां पिछले दिनों मैंने हिमाचल के विभिन्न जगहों पर यात्रा की थी।

        यह यात्रा मैंने 13 जून 2019 दिन गुरुवार को शुरुआत की थी। जाने से पहले कोई निश्चित डेट नहीं तय था अचानक ही प्लान बन गया और समान पैक कर घर से निकल गया। रात में 10 बजे मगध पकड़ा। वैसे तो आजकल रोज समय पर ही चल रही है लेकिन उस दिन लेट कर दी और दिल्ली पहुँचाते-पहुँचाते 4 घण्टा लेट कर दी। ऊपर से गर्मी भी बहुत थी। दिल्ली में New Ashok Nagar metro के पास मेरा एक भाई रहता है, मयंक नाम है उसका। मैं उसी के यहाँ ठहरा। वह एक फोटोग्राफर भी है उसने भी मेरे साथ हिमाचल चलने की योजना बनाई थी लेकिन एन मौके पर उसको कोई काम आ गया था अतः मुझको अकेले ही जाने की तैयारी करनी पड़ी। चूंकि बिना confirm seat के क्या हाल होता है वो मुझे दिल्ली आते वक्त पता चल गया था इसलिए आगे ट्रेन से जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। मयंक ने makemytrip app से एक बस बुक किया जो दिल्ली से पठान कोट जाती थी। वहाँ पठानकोट से 35 किमी पूर्व हिमाचल के कांगड़ा जिले के भडवार नामक गाँव में मेरे एक मित्र रहते थे उन्होंने ही मुझे हिमाचल बुलाया था।

वहाँ दिल्ली में बहुत गर्मी पड़ रही थी। चूँकि अगले दिन रात को गाड़ी का टिकट था सो हमलोगों ने मार्केट जाने का प्लान बनाया लेकिन दिन में धूप के कारण हिम्मत ही नहीं किया। शाम को 5 बजे के बाद ही घर से निकले। हमारी बस लालकिला मेट्रो गेट नंबर 4 से खुलने वाली थी। निर्धारित समय पूर्व हम बस के पास पहुँच गए लेकिन वहाँ पता चला कि टिकट बुक करते वक्त date अगले दिन का डला गया था। एकबारगी लगा कि आज का जाना कैंसल, क्योंकि रात 10:20 के बाद उधर की कोई और बस नहीं थी लेकिन फिर कंडक्टर से बात करने के बाद उसने उसी बस में सीट मुहैया करा दी। बाद मैं मैंने makemytrip वाला टिकट cancel कर refund प्राप्त कर लिया।

#लाइन_होटल:-
ये बस और ढाबे वाले भी न मिलकर कमाई का एक से एक उपाय करते है। रास्ते मे हमारी बस एक ढाबे पर रुकी। वैसे हमे खाने का मन नहीं था लेकिन हमारे साथ वाले एक यात्री जिनसे यात्रा के क्रम में परिचय हो गया था वे बार-बार आग्रह करने लगे कि हमलोग shared खाएंगे तो कम पैसा लगेगा। खाने के मेनू देखने के बाद हमने अनुमान लगाया कि मेरा एक सौ कुछ रुपया खर्च हो सकता है। लेकिन जब बिल चुकाने गए तो 2 आदमी का 400 रु बिल बना दिया। पूछने पर कहने लगा कि मैंने जो सलाद और रायता भोजन के साथ भिजवाई थी अगर उसको नहीं खाना था तो वापस करना चाहिए था। वो हम हर ग्राहक को भिजवाते है। अब हमें क्या पता कि हमने जो आर्डर किया उससे अतिरिक्त भी वो लोग भिजवा देंगे और हमे सेलेक्ट कर वापस करना है…
ऐसा पूछने पर उनलोगों ने हमको मेनू में ही एक छोटे अक्षरों में लिखा कोई नियम दिखाकर बताने लगे कि आपको मेनू ध्यान से पढ़ना चाहिए था। खैर अंजान जगह के चलते ज्यादा कीच-कीच नहीं किए और पैसा चुका कर आगे चलते बने। लेकिन यह मुझे सबक जरूर सीखा गया कि बाहर कहीं भी खाए तो मेनू को ध्यान से पढ़े। 16 को सुबह 9 बजे तक हम पठानकोट में थे।

Day 4 (16 जून 2019)
आज भडवार (हिमाचल) में…

मेरे एक मित्र है ईशान शर्मा जी, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के नूरपुर तहशील में हाइवे पर ही एक छोटा सा गाँव है भडवार वही के निवासी है। हिमाचल में मुझे इन्हीं के यहाँ जाना था। सुबह पठानकोट उतर कर वही खा पी लिया था। वहाँ से नूरपुर वाली बस पकड़ लिया। पठानकोट से भडवार 32 किमी था। पंजाब से हिमाचल में प्रवेश करते ही पहाड़ी शुरू हो गई और धीरे-धीरे मौसम में ठंडकपन भी। जब भडवार पहुँचा ऐसा अहसास होने लगा कि हम मार्च के महीने में है लेकिन वहाँ के लोग इसी को लू बोल रहे थे। मन ही मन सोच रहा था कि अगर इस वे इस वक्त हमारे यहाँ होते तो क्या बोलते?
वहाँ दोपहर में पहुँच कर नहा धो आराम किया। वहाँ जाते ही ईशान जी ने हिमाचल भ्रमण की बड़ी लम्बा-चौड़ा प्लान बना दिया। लेकिन एक ही बार में सारा हिमाचल घूमना हमसे संभव नहीं था सो कुछ सेलेक्टिव जगहों पर एक-एक कर मैंने घूमने का फैसला किया। उनका एक चचेरा भाई था विनय, जो हमारी ही उम्र का था। वो मेरे साथ एक दो दिन घूमने के लिए तैयार हो गया।

#नूरपुर किला का भ्रमण…

विनय के साथ ही हमने आज लोकल घूमने का प्लान बनाया। ईशान भैया से ही मैंने एक स्कूटी लिया और निकल लिया नूरपुर के लिए। नूरपुर यहाँ से 6 किमी के आसपास था। वहाँ वो अस्पताल में x-ray मशीन में काम करता था सो बहुत जान पहचान थी उसकी हर गली में कोई न कोई जान पहचान का मिल ही जाता। वो रास्ते भर अपने इस जान पहचान और क्षेत्र में अपने प्रभाव के किस्से सुनाते हुए चला।

#नूरपुर का इतिहास:-
नूरपुर नूरजहाँ के नाम पर बना है। कहते है नूरजहाँ का दिल इस जगह पर आ गया और वो यही रहने की जिद करने लगी। इस वजह से इस जगह का नाम नूरपुर हो गया। इससे पहले इस जगह को धमड़ी कहा जाता था। इस किले में एक प्राचीन “श्री वृजराज स्वामी मंदिर” भी विद्यमान है जिसे इस किले के अंतिम शासक रहे राजा जगत सिंह ने बनवाया था। यह मंदिर श्री कृष्ण भगवान और मीरा की है। वहाँ के लोकल लोग कह रहे थे कि यह एकलौता मंदिर है जिसमें श्री कृष्ण के साथ “मीरा बाई” की प्रतिमा स्थापित हुई है।
किले के अंदर ही सरकारी विद्यालय भी चलते थे साथ ही पर्यटकों के लिए सुंदर-सुंदर पार्क का भी निर्माण किया गया था। किले के ऊपर से देखने पर जबर कुंड (सहायक नदी, चक्की) मनोरम दृश्य उतपन्न करता था। लौटते वक्त नूरपुर के बगल में ही स्थित नगीना माता मंदिर भी दर्शन को गए। वहाँ शाम बड़ी देर से होती है। मैंने अचानक घड़ी देखा तो पौने 8 बज चुके थे और सूरज की हल्की रौशनी अभी भी विद्यमान थी। मेरे लिए तो यह पहला ही अनुभव था क्योंकि मेरे बिहार में ज्यादा से ज्यादा 7 या सवा 7 तक अंधेरा हो जाता था। अंधेरा होते-होते हमलोग घर पहुँच गए।
क्रमशः

(नोट:- हमारी यह यात्रा कुल 13 दिनों की थी, सो ज्यादा लंबा पोस्ट लिखने से बचने के लिए इसे हम पार्ट वाइज और डेट वाइज ही पोस्ट कर रहे है, हर पोस्ट के नीचे आपको इस यात्रा से जुड़े सभी पोस्ट लिंक मिल जाएंगे)

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